दिव्य विचार स्वप्रेरणा
(अंदर से सन्यास बाहर से संसार के अभ्यास से ही धरती पर हस्त हुआ जीवन मिलेगा )
· हताश ना होना सफलता का परम मूल है, उत्साह मनुष्य को कर्मो में प्रेरित करता है और उत्साह ही कर्म को सफल बनता है!
· सत्य मेरी माता, ज्ञान मेरा पिता, धर्मं मेरा बन्धु, दया मेरा सखा, शांति मेरी पत्नी तथा छमा मेरी संतान है , यही मेरे रिश्तेदार है!
· जैसे चन्द्रमा अमृत बरसाता है और नाग विष ही उगलता है; वैसे ही सज्जन पुरुष सबके गुणों का ही वर्णन करते है , जबकि असाधु लोग सबके दोषों को ही उजागर करते रहते है !
· बुद्धिमान व्यक्ति यदि विद्या या अर्थ का उपार्जन करना चाहे, तो स्वयं को अजर-अमर सोचना चाहिए और यदि उसे धर्म या मुक्ति कि कामना हो, तो वह स्मरण रखे कि मृत्यु ही उसके केश पकड़कर खीच रही है !
· जो कुछ उत्तम लगे उसे आज ही कर डालो क्युकि वृद्ध होने के बाद क्या करोगे? उस समय तो अंगो में दुर्वलता आ जाने से शरीर ही एक बोझ सा बन जायेगा!
· लज्जा, घृणा और भय जिन्हें नहीं सताता एबं जिनका चिंतन सदेव यही रहता है कि आत्मा मोक्ष हो तथा जगत का कल्याण हो ऐसे मानव पृथ्वी के देवता होते है
· अधिकार लालसा और ईर्षा से दूर रहने पर आत्म विश्वास जाग्रति होता है ।
· नारी , मदिरा तथा धन - ये तीन प्रकार के माद्य होते है ! इनमे से एक देखने मात्र से ,दूसरा पीने और तीसरा अति संचय से उन्मत्त बना देता है !
· वासना - कामना का त्याग करना सुमेरु पर्वत को उखाड़ने से भी अधिक कठिन है !
· जो व्यक्ति परोपकारी है , परदुख से दुखी है और अंतरात्मा के शीतल बुद्धि के द्वारा ज्ञानी है , उसी को मै सुखी मानता हूँ !
वासना - कामना का त्याग करना सुमेरु पर्वत को उखाड़ने से भी अधिक कठिन है
ReplyDeletesatay hai
raja