Tantra Me Panchamakar Ek Rahashya Hai


कमाख्ये   वरदे देवी    नील   पर्वत   वासिनी ।
त्वम् देवि जगताम  माययोनिमुद्रे  नमोस्तुते  ।।

तंत्र में पंचमकार एक रहस्य  है ।दस  महा विद्या मनुष्य की जागृति अवस्था है यदि मनुष्य स्वयं को पहचान ले तो ब्रह्म के करीब होता है  पढो समझो और विचार करो........





जैसे दीपक में तेल न हो, तो वह जल नहीं सकता, वैसे ही ईश्वर न हो, तो मनुष्य जी नहीं सकता ! ईश्वर और जीव का बहुत ही निकट का सम्बन्ध है - जैसे चुम्बक और लोहे का ; तो भी ईश्वर जीव को आकर्षित क्यों नहीं कर पता ? यदि लोहे पर बहुत अधिक कीचड लिपटा हो, तो जैसे  वह चुम्बक के द्वारा आकृष्ट नहीं होता, वैसे ही जीव यदि मायारूपी कीचड में अत्यधिक लिपता हो, तो उस पर ईश्वर के आकर्षण का असर नहीं होता ! फिर जैसे कीचड को जल से धो डालने पर लोहा चुम्बक की ओर खिचने लगता है , वैसे ही जब जीव अवरित प्रार्थना और पश्चाताप  के आशुओं से इस संसार -बन्धन में डालनेवाली माया के कीचड को धो डालता है, तब वह तेजी से ईश्वर की ओर खिचता चला जाता है !